साप्ताहिक मौसम विश्लेषण-24 अगस्त 2026: El Niño मजबूत, मानसून कमजोर और असमान बारिश, जानें अगले सप्ताह का मौसम
मुख्य मौसम बिंदु
- स्काईमेट ने 2026 मानसून का अनुमान घटाकर 85% LPA किया है।
- देश में सूखे की संभावना 70% तक पहुंच गई है।
- पूर्वी-मध्य भारत में भारी बारिश, लेकिन दक्षिण में कमी बरकरार।
- El Niño मजबूत हो रहा है और मानसून पर जोखिम बढ़ा रहा है।
- पूर्वानुमान वैधता: अगस्त के अंतिम सप्ताह से मानसून सीजन के शेष चरण तक यह विश्लेषण मान्य है।
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अगस्त का आखिरी सप्ताह शुरू हो चुका है और भारत में मानसून की स्थिति पहले से ज्यादा असमान नजर आ रही है। बंगाल की खाड़ी से लगातार कई मौसम प्रणालियां बन रही हैं, लेकिन इनसे होने वाली बारिश पूरे देश में मानसून की कमी को दूर करने के लिए पर्याप्त साबित नहीं हो रही है। दक्षिणी प्रायद्वीप के बड़े हिस्से और अन्य कम बारिश वाले क्षेत्रों में अभी भी बारिश सामान्य से कम है। दूसरी ओर, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में समय-समय पर बहुत तेज बारिश हो रही है।
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इसी बीच प्रशांत महासागर में El Niño लगातार मजबूत हो रहा है। समुद्र की सतह के साथ-साथ समुद्र के नीचे भी काफी गर्मी जमा है, जो El Niño को और मजबूत कर सकती है। मानसून अब अपने अंतिम चरण में पहुंच रहा है, इसलिए बदलता हुआ यह जलवायु संकेत आने वाले समय के लिए काफी महत्वपूर्ण हो गया है।
मानसून पूर्वानुमान और सूखे का खतरा
स्काईमेट ने 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून के अपने पूर्वानुमान को 94% से घटाकर 85% LPA कर दिया है। इसके साथ देश में सूखे की 70% संभावना जताई गई है। अगस्त में बारिश LPA की 84% और सितंबर में 80% LPA रहने का अनुमान है। अब तक बारिश के आंकड़े भी इस कमजोर पूर्वानुमान की दिशा का समर्थन करते हैं, हालांकि इससे यह जरूरी नहीं है कि अंतिम बारिश की कमी बिल्कुल इतनी ही रहेगी।
13 से 19 अगस्त के दौरान पूरे देश में बारिश सामान्य से 16% कम रही। 19 अगस्त तक पूरे मानसून सीजन की संचयी बारिश लगभग 13% कम थी। इसी अवधि में दक्षिणी प्रायद्वीप में बारिश सामान्य से 54% कम रही, जबकि पूरे सीजन की कमी लगभग 22% थी। पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में हाल की भारी बारिश के बावजूद पूरे सीजन की बारिश लगभग 25% कम है। इसके मुकाबले मध्य भारत की स्थिति बेहतर है और यहां मौसमी बारिश करीब 1% कम है।
बंगाल की खाड़ी की प्रणालियां भारी बारिश करा रही हैं, लेकिन सीमित क्षेत्र में
उत्तर-पश्चिमी बंगाल की खाड़ी से बना निम्न दबाव क्षेत्र अब जमीन पर आ चुका है और पश्चिम बंगाल, उत्तर ओडिशा तथा झारखंड के हिस्सों से होकर आगे बढ़ रहा है। इससे जुड़ा चक्रवाती परिसंचरण वायुमंडल की काफी ऊंचाई तक फैला हुआ है। मानसून ट्रफ और करीब 22° उत्तरी अक्षांश पर बने पूर्व-पश्चिम दिशा वाले शियर जोन से मिल रहे समर्थन के कारण यह सिस्टम 24 से 26 अगस्त के दौरान ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पूर्वी मध्य प्रदेश में व्यापक बारिश और गरज-चमक की गतिविधियां बनाए रखेगा। इसका असर झारखंड, उत्तर प्रदेश, पश्चिमी मध्य प्रदेश और उससे सटे राजस्थान के हिस्सों तक भी पहुंच सकता है।
26 अगस्त के आसपास राजस्थान से तेज मौसम गतिविधियां हटने लगेंगी, जबकि 27 अगस्त तक मध्य प्रदेश से भी इसका प्रभाव कम हो जाएगा। इसके बाद बारिश का सक्रिय क्षेत्र पूर्व की ओर खिसकते हुए बिहार, झारखंड, उत्तर छत्तीसगढ़, उत्तर ओडिशा और गंगीय पश्चिम बंगाल की ओर पहुंच सकता है। केरल, तटीय कर्नाटक और गोवा में मानसून सक्रिय बना रहेगा। लेकिन पश्चिमी, मध्य और दक्षिणी भारत के बड़े हिस्सों में अगस्त के बाकी दिनों में बारिश की कोई बड़ी वापसी होने की संभावना कम है। इस तरह बंगाल की खाड़ी से आने वाली लगातार प्रणालियां पूर्वी भारत के पहले से ही ज्यादा बारिश वाले क्षेत्रों में बाढ़ का खतरा बढ़ा सकती हैं, लेकिन दक्षिण और उत्तर-पश्चिम के कम बारिश वाले क्षेत्रों में बारिश की कमी को काफी हद तक दूर नहीं कर पाएंगी।
El Niño का खतरा बढ़ा
El Niño लगातार मजबूत हो रहा है, लेकिन केवल इसकी ताकत से यह तय नहीं होता कि भारत में इसका असर कितना होगा। भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से काफी गर्म है और समुद्र की सतह के नीचे भी बड़ी मात्रा में गर्मी जमा है। अगस्त के मध्य तक Niño 3.4 इंडेक्स +1.8°C तक पहुंच गया था। वहीं, भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के पूर्वी हिस्से में तापमान में बढ़ोतरी और भी ज्यादा रही है। प्रशांत महासागर के पूर्वी हिस्से में केंद्रित यह गर्मी अब उस पैटर्न से मिलती-जुलती दिखाई दे रही है जिसे Canonical या Eastern Pacific El Niño कहा जाता है। इतिहास में इस तरह का El Niño भारतीय मानसून के लिए महत्वपूर्ण जोखिम कारक रहा है।
अमेरिकी मौसम एजेंसी NOAA के नवीनतम पूर्वानुमान के अनुसार, अक्टूबर से दिसंबर 2026 के दौरान बहुत मजबूत El Niño बनने की 81% संभावना है। हालांकि, भारत पर इसका वास्तविक असर केवल El Niño की ताकत पर निर्भर नहीं करेगा। इसके लिए यह भी महत्वपूर्ण होगा कि प्रशांत महासागर में गर्मी कहां केंद्रित है और उसका Indian Ocean Dipole (IOD), MJO तथा अलग-अलग मानसूनी प्रणालियों के साथ किस तरह का तालमेल बनता है।
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IOD के पॉजिटिव होने की संभावना, लेकिन अभी अनिश्चितता
हिंद महासागर द्विध्रुव यानी IOD फिलहाल न्यूट्रल स्थिति में है। ऑस्ट्रेलिया के मौसम विज्ञान ब्यूरो (Bureau of Meteorology) के अनुसार, 9 अगस्त को समाप्त हुए सप्ताह में IOD इंडेक्स +0.41°C रहा। यह लगातार तीसरा सप्ताह था जब IOD पॉजिटिव IOD की सीमा पर बना रहा। मौसम मॉडल अब भी संकेत दे रहे हैं कि आगे चलकर Positive IOD विकसित हो सकता है। हालांकि, इसके बनने का समय और इसकी ताकत अभी स्पष्ट नहीं है। अगर Positive IOD मानसून के काफी अंतिम चरण में विकसित होता है, तो इससे सीजन के दौरान पहले ही जमा हो चुकी बारिश की कमी को पूरा करने में सीमित मदद मिल सकती है।
MJO से तत्काल ज्यादा मदद की उम्मीद नहीं
Madden-Julian Oscillation यानी MJO आने वाले समय में भारतीय समुद्री क्षेत्र में संगठित और लंबे समय तक सक्रिय मानसूनी गतिविधियों को मजबूत समर्थन देने की स्थिति में नहीं है।फिलहाल MJO का संकेत कमजोर है। साथ ही, मजबूत हो रहे El Niño के साथ इसकी परस्पर क्रिया उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में बादल और बारिश की गतिविधियों को प्रभावित कर रही है।इसलिए निकट अवधि में MJO से मानसून को किसी बड़े और लगातार समर्थन की उम्मीद कम है।
कृषि और पानी: अब सिर्फ बुवाई का क्षेत्र देखना पर्याप्त नहीं
खरीफ फसलों की बुवाई अब काफी आगे बढ़ चुकी है। इसलिए केवल कितने क्षेत्र में बुवाई हुई है, इसे कृषि जोखिम का आकलन करने का सबसे महत्वपूर्ण पैमाना नहीं माना जा सकता। अब ज्यादा ध्यान इस बात पर देना जरूरी है कि फसलों के अलग-अलग विकास चरणों में मिट्टी में कितनी नमी है, सिंचाई के लिए जलाशयों में कितना पानी उपलब्ध है और आखिर में फसल की उपज कितनी रह सकती है। यह चिंता खास तौर पर धान, सोयाबीन, कपास, मक्का और दलहन जैसी फसलों के लिए महत्वपूर्ण है।
जलाशयों की स्थिति भी चिंता का विषय बनी हुई है। केंद्रीय जल आयोग (CWC) 166 जलाशयों की निगरानी करता है, जिनकी कुल जीवित भंडारण क्षमता लगभग 183.6 BCM है। सीजन की शुरुआत की तुलना में जलाशयों में पानी की स्थिति में सुधार जरूर हुआ है, लेकिन पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में भंडारण अभी भी काफी कम है। इनमें दक्षिण भारत उन क्षेत्रों में शामिल है जहां पिछले साल के मुकाबले पानी की कमी ज्यादा है।
ऊर्जा: मौसम का असर अब बिजली बाजार पर भी दिख रहा है
भारत में बिजली व्यवस्था तेजी से बदल रही है। इसके साथ मौसम और कम अवधि के बिजली बाजार के बीच संबंध भी मजबूत हो रहा है। 24 अगस्त को डिलीवरी के लिए IEX Day-Ahead Market में औसत Market Clearing Price करीब ₹7.30 प्रति यूनिट रहा, जबकि अधिकतम कीमत ₹10 प्रति यूनिट तक पहुंची। इस दौरान क्लियर और अंतिम रूप से शेड्यूल की गई बिजली की मात्रा लगभग 1,66,275 MWh रही। ये आंकड़े बिजली एक्सचेंज में कुछ समय के लिए मांग और उपलब्धता के बीच दबाव की स्थिति दिखाते हैं। हालांकि, इन्हें पूरे देश में बिजली की कमी का संकेत नहीं माना जाना चाहिए।
दूसरी ओर, भारत में सौर और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता तेजी से बढ़ रही है। इससे दिन के समय सौर बिजली की उपलब्धता काफी अधिक हो सकती है, लेकिन सूर्यास्त के बाद उत्पादन तेजी से घट सकता है। उस समय बिजली की मांग ऊंची बनी रह सकती है। इसलिए बादलों की स्थिति, सौर विकिरण, हवा, बारिश और तापमान का सटीक और अल्पकालिक पूर्वानुमान अब काफी महत्वपूर्ण हो गया है। इससे नवीकरणीय बिजली उत्पादन, बिजली की वास्तविक मांग, ऊर्जा भंडारण की जरूरत और बिजली बाजार की कीमतों का बेहतर अनुमान लगाया जा सकता है।
अगले सप्ताह का मौसम
26 अगस्त तक बारिश का मुख्य फोकस पूर्वी और उससे सटे मध्य भारत में रहेगा। इसके बाद तेज मौसम गतिविधियों का क्षेत्र पूर्व की ओर खिसकते हुए बिहार, झारखंड, उत्तर छत्तीसगढ़, उत्तर ओडिशा और गंगीय पश्चिम बंगाल की ओर बढ़ेगा। इन क्षेत्रों में भारी बारिश होने के बावजूद पूरे देश का मानसून अभी भी सामान्य से कम और भौगोलिक रूप से काफी असमान बना हुआ है।
बड़े स्तर पर मौसम का सबसे महत्वपूर्ण जोखिम El Niño बना हुआ है, जिसके आगे और मजबूत होने की संभावना है। इसके साथ IOD की अनिश्चित स्थिति, MJO से सीमित समर्थन और बंगाल की खाड़ी की अलग-अलग मौसम प्रणालियां मानसून के बचे हुए दिनों का प्रदर्शन तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।
निष्कर्ष: देश में सूखा, कुछ हिस्सों में बाढ़ जैसी स्थिति
2026 के मानसून का पैटर्न अब धीरे-धीरे स्पष्ट होता जा रहा है-देश के स्तर पर सूखे जैसी स्थिति, लेकिन कुछ इलाकों में बहुत ज्यादा बारिश। इसलिए अब सबसे बड़ा सवाल केवल यह नहीं है कि भारत में कुल कितनी बारिश होती है, बल्कि यह है कि बारिश कहां होती है और जिन क्षेत्रों को बारिश की सबसे ज्यादा जरूरत है, वहां पर्याप्त बारिश पहुंचती है या नहीं।
















