हिमालय में भारी बर्फ की कमी से बिगड़ सकता है पर्यावरणीय संतुलन, मानसून पर भी असर संभव क्यों?

By: AVM GP Sharma | Edited By: Mohini Sharma
Jan 20, 2026, 7:30 PM
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बर्फबारी की भारी कमी से हिमालय संकट में, फोटो: AI-Skymet

मुख्य मौसम बिंदु

  • पूरे हिमालय में दिसंबर–जनवरी में लगभग शून्य बर्फबारी।
  • कमजोर और अनियमित पश्चिमी विक्षोभ बने कारण।
  • जल स्रोत, पर्यटन और पर्यावरण पर गंभीर असर।
  • कम बर्फ से आने वाले मानसून पर भी खतरा।

इस सर्दी के मौसम में पूरे हिमालयी क्षेत्र में बर्फबारी बहुत कम हुई है। यह कमी असामान्य है और पहले से अनुमान नहीं लगाया गया था। दिसंबर से शुरू हुई यह समस्या जनवरी तक जारी रही, जिससे हालात और गंभीर हो गए हैं। बर्फ का असमान और बेहद कम वितरण आने वाले समय में कई बड़े खतरों की ओर इशारा कर रहा है। पहाड़ों पर बर्फबारी न होने से जंगलों की हरियाली खतरे में है और ऊंचाई वाले इलाकों में जंगल में आग लगने की संभावना बढ़ गई है। बर्फबारी नहीं होने का ग्लेशियरों पर भी असर पड़ा है। वहीं,बर्फ से ढकी ऊंची चोटियों की पारंपरिक चमक भी फीकी पड़ गई है। पानी के स्रोतों में कमी से आगे चलकर सूखे का खतरा हो सकता है।

दिसंबर-जनवरी पूरी तरह सूखे, पहाड़ों की चमक हुई फीकी

उत्तर भारत के पहाड़ी राज्यों जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में दिसंबर और जनवरी दोनों महीनों में लगभग बर्फबारी नहीं हुई। इन सभी राज्यों में जनवरी महीने के दौरान भी बर्फबारी का अभाव लगभग 100 प्रतिशत बना हुआ है। इस बार सीजन बेहद शुष्क सर्दी का रहा है। आमतौर पर इस समय पहाड़ बर्फ से ढके रहते हैं, लेकिन इस बार चोटियाँ सूनी और काली नजर आ रही हैं। बर्फ की कमी का असर पर्यटन, खेती और जलविद्युत परियोजनाओं जैसे कई क्षेत्रों पर साफ दिखने लगा है और फिलहाल राहत के संकेत नहीं हैं।

पश्चिमी विक्षोभ कमजोर पड़े, बर्फ नहीं ला सके

हिमालय में बर्फबारी पश्चिमी विक्षोभ के कारण होती है, लेकिन इस बार ये सिस्टम समय पर नहीं आए या कमजोर रहे। कई बार ये अपने तय रास्ते से भी भटक गए, जिससे पहाड़ों में बर्फ नहीं गिर सकी। इसी वजह से पूरे क्षेत्र में “स्नो ड्रॉट” यानी बर्फ का सूखा पैदा हो गया। इसका असर पर्यावरण, पर्यटन, बिजली उत्पादन, खेल, कृषि, हिमनद झीलों और जल प्रबंधन जैसे क्षेत्रों पर पड़ रहा है।

जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक बदलाव और आने वाले मानसून पर असर

पहाड़ों पर बर्फ की कमी पहली बार नहीं हुई है, इससे पहले भी ऐसे हालात देखे जा चुके हैं। इसे अक्सर ग्लोबल वार्मिंग से जोड़ा जाता है, क्योंकि ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन से वातावरण गर्म हो रहा है और निचले इलाकों में बर्फ की सीमा ऊपर खिसकती जा रही है। साथ ही यह भी सच है कि वातावरण हमेशा गतिशील रहता है और प्राकृतिक जलवायु परिवर्तनशीलता के प्रति संवेदनशील होता है। इससे पश्चिमी विक्षोभों की ताकत, आवृत्ति और रास्तों में बड़ा बदलाव आ सकता है। यूरेशिया हो या हिमालय, पहाड़ों पर सर्दियों में जमा बर्फ का सीधा संबंध मानसून के बनने और टिके रहने से होता है। अगर बर्फ कम रही तो मानसून भी कमजोर हो सकता है। हालांकि आने वाले दिनों में कुछ बारिश और बर्फबारी होने की उम्मीद है, जिससे अब तक हुए नुकसान की भरपाई थोड़ी हो सकती है।

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AVM GP Sharma
President of Meteorology & Climate Change
AVM Sharma, President of Meteorology & Climate Change at Skymet Weather Services, is a retired Indian Air Force officer who previously led the Meteorological Branch at Air Headquarters in New Delhi. With over a decade of experience at Skymet, he brings a wealth of knowledge and expertise to the organization.
FAQ

पश्चिमी विक्षोभ कमजोर और अनियमित रहे, साथ ही जलवायु परिवर्तन का असर भी दिखा।

जल संकट, जंगलों में आग और ग्लेशियरों पर दबाव बढ़ना।

आने वाला गीला मौसम कुछ हद तक नुकसान की भरपाई कर सकता है।

डिस्क्लेमर: यह जानकारी स्काइमेट की पूर्वानुमान टीम द्वारा किए गए मौसम और जलवायु विश्लेषण पर आधारित है। हम वैज्ञानिक रूप से सही जानकारी देने का प्रयास करते हैं, लेकिन बदलती वायुमंडलीय स्थितियों के कारण मौसम में बदलाव संभव है। यह केवल सूचना के लिए है, इसे पूरी तरह निश्चित भविष्यवाणी न मानें।

Skymet भारत की सबसे बेहतर और सटीक निजी मौसम पूर्वानुमान और जलवायु इंटेलिजेंस कंपनी है, जो देशभर में विश्वसनीय मौसम डेटा, मानसून अपडेट और कृषि जोखिम प्रबंधन समाधान प्रदान करती है