मौसम आधारित फसल बीमा योजना (डबल्यूबीसीआईएस) वर्ष 2007 के खरीफ ऋतु से प्रायोगिक तौर पर क्रियान्वित की जा रही है। डबल्यूबीसीआईएस कार्यक्रम को सरकारी वित्तीय सहायता से चलाया जाता है। जिसमें 50 प्रतिशत तक वित्तीय अनुदान दिया जाता है, इसमें केंद्र सरकार और संबद्ध राज्य सरकारों की बराबर की भागीदारी होती है।
विगत 7-8 वर्षों में डबल्यूबीसीआईएस का दायरा बढ़ा है, और वर्तमान में देश की कुल कृषि के 10-12 प्रतिशत क्षेत्रफल पर इसका लाभ पहुँच रहा है। मौसम आधारित योजना में ऐसा माना जाता है कि मौसम और कृषि उत्पादकता में बहुत गहरा नाता है, और मौसम में आने वाले उतार चढ़ाव के आंकड़ों के संकलन से उत्पादकता के नुकसान का अनुमान लगाया जा सकता है। इसी परिप्रेक्ष्य में डबल्यूबीसीआईएस को प्रायोगिक तौर पर उन फसलों पर लागू किया जाता है जो मौसम से अधिक प्रभावित होती हैं।
परंपरागत कृषि बीमा में जहां फसल की उत्पादकता में कमी की क्षतिपूर्ति की जाती है वहीं डबल्यूबीसीआईएस मौसम की उन गतिविधियों पर आधारित है जो फसल की उत्पादकता को प्रभावित करती हैं, भले ही किसान ने अच्छी उत्पादकता पाने के लिए कितने उपाय क्यों ना किए हों। फसल उत्पादकता के साथ मौसम के मापदण्डों के ऐतिहासिक अध्ययन से फसल पर मौसम के दुष्प्रभाव के अलावा भी बहुत कुछ समझने में मदद मिलती है।
मौसम के जिन कारकों से किसानों को अत्यधिक नुकसान होता रहा है भुगतानकी संरचना ऐसे ही नुक़सानों की भरपाई के लिए विकसित की गई है। दूसरे शब्दों में कहें तो तापमान, वर्षा, आर्द्रता, हवा की गति एवं हवा की दिशा आदि फसल की उत्पादकता को प्रभावित करते हैं, और डबल्यूबीसीआईएस में क्षतिपूर्ति के लिए इन्हीं कारकों को आधार बनाया जाता है।
मौसम आधारित बीमा में एक गंभीर चुनौती है 'बेसिस रिस्क' की। इसका तात्पर्य है वेदर स्टेशन पर और उससे जोड़े गए किसान के खेत के पास घटित होने वाले मौसम में अंतर। दूसरे शब्दों में कहें कि वेदर स्टेशन के आसपास के खेतों में मौसम लगभग समान होगा, जिससे 'बेसिस रिस्क' भी कम होगा। अतः जहां भी सूक्ष्म स्तर पर मौसम में बदलाव आता हो वहाँ वेदर स्टेशन की संख्या बढ़ाकर मौसम आधारित बीमा को और प्रभावी बनाया जा सकता है। वेदर स्टेशन के 5 किमी के दायरे में आने वाले बीमित खेतों में बेसिस रिस्क कम हो सकता है। जबकि 5 किमी के दायरे के बाहर वाले खेतों में बेसिस रिस्क के आधार पर अनिश्चितता बढ़ सकती है।
एक अनुमान के आधार पर डबल्यूबीसीआईएस के लिए प्रत्येक 5 किमी में एक वेदर स्टेशन के हिसाब से देश भर में लगभग 40,000 वेदर स्टेशन लगाए जाने की ज़रूरत पड़ेगी। इस क्षेत्र की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए स्काईमेट और एनसीएमएल आदि निजी कंपनियाँ बाज़ार में आईं, जो बीमा कंपनियों को सशुल्क मौसम के आंकड़े उपलब्ध कराती हैं। हालांकि सार्वजनिक वेदर स्टेशन के नेटवर्क के पूर्ण उपयोग के क्रम में बीमा कंपनियाँ वहीं निजी कंपनियों से मौसम के आंकड़े ले रही हैं जहां सार्वजनिक वेदर स्टेशन नहीं हैं।
वर्तमान समय में एडबल्यूएस कवरेज को लेकर अलग अलग राज्यों में अलग अलग दिशानिर्देश तय किए गए गए हैं। अधिकांश राज्यों में 10 से 15 किलोमीटर के दायरे के लिए 2 एडबल्यूएस की सिफ़ारिश की जाती है। समान भौगोलिक स्थिति वाले मैदानी इलाकों में 10 किलोमीटर के दायरे में एक वेदर स्टेशन प्रासंगिक हो सकता है लेकिन पर्वतीय या ऊंचे नीचे वाले भागों में दूरी को घटकर 5 किलोमीटर किया जाना चाहिए। मौसम के भरोसेमंद डाटा बेस के लिए वेदर स्टेशनों के साथ-साथ एआरजी की भी आवश्यकता पड़ेगी।
मौसम के आंकड़े उपलब्ध कराने वाली कंपनियों की बढ़ती संख्या को देखते हुये वेदर स्टेशन लगाने, उनकी देखभाल करने और आंकड़ों की सत्यता सुनिश्चित करने के लिए नियम और मानदंड बनाए जाने की आवश्यकता है। इस प्रक्रिया की निगरानी भारतीय मौसम विभाग और कृषि एवं सहकारिता विभाग कर रहे हैं। प्रारम्भ में सरकार की इच्छा थी कि वेदर स्टेशन को मान्यता और उसकी पुष्टि का दायित्व आईएमडी संभाले। हालांकि आईएमडी इस दायित्व को संभालने के लिए सहमत नहीं हुआ था क्योंकि वह अन्य महत्वपूर्ण कार्य में पहले से ही व्यस्त है। अब हम यह कह सकते हैं की डबल्यूबीसीआईएस के लिए राज्य सरकारों की स्वीकृति से अधिक वेदर स्टेशनों की स्थापना करने के साथ कृषि जोखिम कम करने में निजी कंपनियाँ एक अच्छा विकल्प हो सकती हैं।